नालों में मेरे अब भी असर है कि नहीं है

नालों में मेरे अब भी असर है कि नहीं है
कुछ तुमको हमारी भी खबर है कि नहीं है

दीवाने भी पल जाते थे अहल-ए-ख़िरद के साथ,
इस दौर में आशिक़ का गुज़र है कि नहीं है

हाकिम ने है बनवाई इक ऊँची कचहरी,
मुफ़लिस के लिए कोई भी दर है कि नहीं है 

सुनते हैं कि गावों का बहुत हो गया फ़रोग,
चौबारे में वो बूढ़ा शजर है कि नहीं है

मिल कर बसाई थी जहाँ इक दूसरी दुनिया,
अब याद वो सपनों का नगर है कि नहीं है

ता-उम्र कर गयी थी जो हम को बेक़रार,
अब भी वो झुकी झुकी नज़र है कि नहीं है

-  प्रताप श्रीवास्तव – 22-7-2018
नालों – फ़रियाद
अहल-ए-ख़िरद – बुद्धिमान लोग
फ़रोग – विकास
शजर – पेड़
मुफ़लिस – ग़रीब
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दाँव उल्टा नहीं सदा होता

दाँव उल्टा नहीं सदा होता,
वक़्त हरदम नहीं बुरा होता

खिल भी जाते ये फूल सेहरा में,
तुम ने मौक़ा ज़रा दिया होता

अपने आईन का है एक उसूल,
कोई तबक़ा नहीं बड़ा होता

हार जातीं ये नफ़रतें अपनी,
सब्र से काम जो लिया होता

भूल सकते थे हम सितम सारे,
तुमने इक बार तो कहा होता

चाहते हम थे कौन सी जागीर,
बस ज़रा हौसला दिया होता

ढूंढते सब हैं कोई नामाबर,
बेसबब बुत नहीं ख़ुदा होता

प्रताप श्रीवास्तव – 23 जून 2018
आईन – संविधान
नामाबर – सन्देश-वाहक
बेसबब – बिना उद्देश्य के

कभी आगे थे वो सारे जहाँ से

कभी आगे थे वो सारे जहाँ से
यही जो हौसले हैं राएगाँ से

ये दुनिया थी कभी जिनके कहे में,
खड़े हैं मुज़्महिल औ बेज़बाँ से

मिले पर मिल के भी वो मिल न पाए,
रहे कुछ अनमने औ बदगुमाँ से

जतन सारे अकारथ हो गए हैं
बने कुछ बात शायद राज़दाँ से

थे जो कल मुब्तला बदकारियों में,
नज़र आते हैं मीर-ए-कारवाँ से

हमारा आशियाँ आबाद रहता,
जो धोका खा न जाते पासबाँ से

– प्रताप श्रीवास्तव – 1 दिसंबर 2017

राएगाँ – बेकार
मुज़्महिल – थके हुए
बदगुमाँ – किसी के बारे में बुरा ख्याल रखे हुए
राज़दाँ – भेद जानने वाला
मुब्तला – व्यस्त
मीर-ए-कारवाँ – क़ाफ़िले का नेता
पासबाँ – रक्षक

ज़िक्र मेरी दीवानगी का है

ज़िक्र मेरी दीवानगी का है
वो सबब सबकी दिल्लगी का है

लग रहे क्यूं ज़बां पे ताले हैं
हुक्म क्या उन की बंदगी का है

बेवजह गीत हम नये लाये
कद्रदां शाह कुहनगी का है

साक़िया कम ये क्यूं नहीं होता
मर्ज़ मेरा जो तिश्नगी का है

मौत से कोई डर नहीं लगता
खौफ बस अब तो ज़िंदगी का है

रहबर-ए-क़ौम हैं हुए नाकाम
इंतज़ार एक ताज़गी का है

प्रताप श्रीवास्तव 14-7-2017
कुहनगी – पुरानापन

 

दुआ

हिंदियों में बनी रवादारी रहे
मेहर इतनी ए मालिक तुम्हारी रहे

बस रफ़ाक़त का दस्तूर क़ायम रहे,
और मोहब्बत में भी जाँनिसारी रहे

मज़हबों के रिवाज़ों की है अहमियत,
आदमीयत मगर उन पे भारी रहे

चाहे कितना ख्यालों में हो इख्तिलाफ़,
साफ़ नीयत तुम्हारी हमारी रहे

सब ख़ुलूस-ओ-सदाक़त की इज़्ज़त करें
फ़र्ज़ की मुल्क में ताबेदारी रहे

दायरे की निशस्तें यूं चलती रहें
ख़िदमत इल्म-ए-अदब की भी जारी रहे

- प्रताप श्रीवास्तव –

कुछ तुझको ख़बर है हम क्या क्या – मजाज़

हम इतना कुछ पाने की कोशिश में लगे रहते हैं, पर क्या क्या गवाँ बैठते हैं ! मजाज़ की एक ग़ज़ल –

कुछ तुझ को है ख़बर हम क्या क्या, ऐ शोरिश-ए-दौराँ भूल गए
वह ज़ुल्फ़-ए-परीशाँ भूल गए, वह दीद-ए-गिरयाँ भूल गए

ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं
ऐ ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या कीजे हम सूरत-ए-जानाँ भूल गए

अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं अब दिल की कली खिलती ही नहीं
ऐ फ़स्ले बहाराँ रुख़्सत हो, हम लुत्फ़-ए-बहाराँ भूल गए

सब का तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके
सब के तो गिरेबाँ सी डाले, अपना ही गिरेबाँ भूल गए

यह अपनी वफ़ा का आलम है, अब उनकी जफ़ा को क्या कहिए
एक नश्तर-ए-ज़हरआगीं रख कर नज़दीक रग-ए-जाँ भूल गए

  • असरार-उल-हक़ ‘मजाज़’
शोरिश-ए-दौराँ – वक़्त की उथल-पुथल
फ़स्ल-ए-बहाराँ – वसंत ऋतु,  मुदावा – इलाज
जफ़ा – सितम

यूं न रह रह कर हमें तरसाइये

यूं न रह रह कर हमें तरसाइये
आइये, आ जाइए, आ जाइए

फिर वोही दानिश्ता ठोकर खाइए
फिर मेरी आगोश में गिर जाइए

मेरी दुनिया मुन्तजिर है आपकी
अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइए

ये हवा, ‘सागर’ ये हल्की चाँदनी
जी में आता है यहीं मर जाइए

   - मास्टर मदन, साग़र निज़ामी – १९३५

 

कोई ४१ साल बाद उसी धुन में एक दूसरे पहलू में यह ग़ज़ल आई –

दिल है हाज़िर, लीजिये, ले जाइए
और क्या क्या चाहिए, फरमाइए

प्यार धोखा है, तो धोखा ही सही,
चाहता है दिल कि धोखा खाइए

हम को अपना इन्तहां मंज़ूर है
और भी तरसाइए, तड़पाइए

इश्क़ वालों का मुक़द्दर है यही,
आप अपनी आग में जल जाइए

ना मिलेंगे आप अच्छी बात है
जीने वाले जी ही लेंगे, जाइए

ढूंढ ही लेंगे कोई अपना ख़ुदा
कब तलक पत्थर से सर टकराइये

  - जां निसार अख्तर – ‘सज्जो रानी, १९७६

My stray musings— This blog is written with my family and immediate circle of friends as intended readership, so everyone may not connect with some of the events or places described; not that I have any objections to others reading it. In fact, they are most welcome–