ज़िक्र मेरी दीवानगी का है

ज़िक्र मेरी दीवानगी का है
वो सबब सबकी दिल्लगी का है

लग रहे क्यूं ज़बां पे ताले हैं
हुक्म क्या उन की बंदगी का है

बेवजह गीत हम नये लाये
कद्रदां शाह कुहनगी का है

साक़िया कम ये क्यूं नहीं होता
मर्ज़ मेरा जो तिश्नगी का है

मौत से कोई डर नहीं लगता
खौफ बस अब तो ज़िंदगी का है

रहबर-ए-क़ौम हैं हुए नाकाम
इंतज़ार एक ताज़गी का है

प्रताप श्रीवास्तव 14-7-2017
कुहनगी – पुरानापन

 

दुआ

हिंदियों में बनी रवादारी रहे
मेहर इतनी ए मालिक तुम्हारी रहे

बस रफ़ाक़त का दस्तूर क़ायम रहे,
और मोहब्बत में भी जाँनिसारी रहे

मज़हबों के रिवाज़ों की है अहमियत,
आदमीयत मगर उन पे भारी रहे

चाहे कितना ख्यालों में हो इख्तिलाफ़,
साफ़ नीयत तुम्हारी हमारी रहे

सब ख़ुलूस-ओ-सदाक़त की इज़्ज़त करें
फ़र्ज़ की मुल्क में ताबेदारी रहे

दायरे की निशस्तें यूं चलती रहें
ख़िदमत इल्म-ए-अदब की भी जारी रहे

- प्रताप श्रीवास्तव –

कुछ तुझको ख़बर है हम क्या क्या – मजाज़

हम इतना कुछ पाने की कोशिश में लगे रहते हैं, पर क्या क्या गवाँ बैठते हैं ! मजाज़ की एक ग़ज़ल –

कुछ तुझ को है ख़बर हम क्या क्या, ऐ शोरिश-ए-दौराँ भूल गए
वह ज़ुल्फ़-ए-परीशाँ भूल गए, वह दीद-ए-गिरयाँ भूल गए

ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं
ऐ ज़ौक़-ए-तसव्वुर क्या कीजे हम सूरत-ए-जानाँ भूल गए

अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं अब दिल की कली खिलती ही नहीं
ऐ फ़स्ले बहाराँ रुख़्सत हो, हम लुत्फ़-ए-बहाराँ भूल गए

सब का तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके
सब के तो गिरेबाँ सी डाले, अपना ही गिरेबाँ भूल गए

यह अपनी वफ़ा का आलम है, अब उनकी जफ़ा को क्या कहिए
एक नश्तर-ए-ज़हरआगीं रख कर नज़दीक रग-ए-जाँ भूल गए

  • असरार-उल-हक़ ‘मजाज़’
शोरिश-ए-दौराँ – वक़्त की उथल-पुथल
फ़स्ल-ए-बहाराँ – वसंत ऋतु,  मुदावा – इलाज
जफ़ा – सितम

यूं न रह रह कर हमें तरसाइये

यूं न रह रह कर हमें तरसाइये
आइये, आ जाइए, आ जाइए

फिर वोही दानिश्ता ठोकर खाइए
फिर मेरी आगोश में गिर जाइए

मेरी दुनिया मुन्तजिर है आपकी
अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइए

ये हवा, ‘सागर’ ये हल्की चाँदनी
जी में आता है यहीं मर जाइए

   - मास्टर मदन, साग़र निज़ामी – १९३५

 

कोई ४१ साल बाद उसी धुन में एक दूसरे पहलू में यह ग़ज़ल आई –

दिल है हाज़िर, लीजिये, ले जाइए
और क्या क्या चाहिए, फरमाइए

प्यार धोखा है, तो धोखा ही सही,
चाहता है दिल कि धोखा खाइए

हम को अपना इन्तहां मंज़ूर है
और भी तरसाइए, तड़पाइए

इश्क़ वालों का मुक़द्दर है यही,
आप अपनी आग में जल जाइए

ना मिलेंगे आप अच्छी बात है
जीने वाले जी ही लेंगे, जाइए

ढूंढ ही लेंगे कोई अपना ख़ुदा
कब तलक पत्थर से सर टकराइये

  - जां निसार अख्तर – ‘सज्जो रानी, १९७६

एक ग़ज़ल

दिन ढलने पर ग़म के साए, मुझको गले लगाते हैं
मुझे अकेला बेबस पाकर, क़ाबिज़ वो हो जाते हैं

एक एक मंसूबे अपने, शाम तलक सब डूब गए,
वक़्त बदलते देर न होगी, दिल को हम बहलाते हैं

साफ़बयानी, बेबाक़ी का, दरबारों में ठौर नहीं,
बात घुमा कर कहने वाले, आलिम अब कहलाते हैं

सबको अपने ही सांचे में, ढाले बिना न दम लेंगे,
मुझको यूं आज़ाद देख कर, बंदिश नई लगाते हैं

दोस्त मेरे, अहबाब मेरे, देख मेरी खामोशी को,
जो बातें ख़ुद समझ ना पाए, मुझको वो समझाते हैं

क़ुदरत का क़ानून है समझो, कोई बदल न पाया है,
बुरे और अच्छे दिन यारों, दोनों आते जाते हैं

- प्रताप श्रीवास्तव

गुजरात के जंगली गधे

इन दिनों गुजरात के जंगली गधों के बारे में गुजरात पर्यटन के लिए किया गया अमिताभ बच्चन का एक विज्ञापन बहुचर्चित है.

ऐसे अनोखे गधे गुजरात में ही क्यूँ पाए जाते हैं? कोई भौगोलिक कारण होगा. जो भी हो, इसमें संदेह नहीं कि गधा जैसा निरीह प्राणी हेय दृष्टि से देखा जाता है. सरल स्वभाव मंदबुद्ध होने का द्योतक है, ऐसी मान्यता है.

बचपन में गधे की उपाधि से बहुधा अलंकृत होने का अवसर मिल जाया करता था. चुनाव के वाक्-युद्धों में गधे की चर्चा ने उन दिनों की याद दिला दी.

हमारे गणित के अध्यापक कुछ अधिक अनुशासनप्रिय थे. गृहकार्य अपूर्ण होने जैसे तुच्छ अपराध उनकी दृष्टि में अक्षम्य थे. वह पहले बेंच पर खड़ा कर देते थे फिर आगे का संवाद ‘अबे गदहे!’ के संबोधन से प्रारम्भ करते थे. ‘गधे’ शब्द का ध्वनि-विच्छेद करके, ‘ग-द-हे’ में परिवर्तन कर के, लम्बी साँस खींच के जो दीर्घ मात्राओं से विस्तार कर के, जो स्नेहातिरेक का प्रहार करते थे, जो अभी तक मानस-पटल पर अंकित है. हमारा मनोबल पूर्णतया तिरोहित नहीं हो जाता था, उसके दो कारण थे. एक तो उनका ही छोटा भाई, जो हमारा सहपाठी था और अपराध का सहभागी भी था, बगल में खड़ा हुआ, अति धीमे स्वरों में उनकी स्वर-लहरी का अनुकरण करता था. गुरुतर कारण यह था कि न जाने कैसे उस गर्जन-तर्जन में एक गुरु का शिष्य-प्रेम भी उतर आता और हमें झलक भी जाता था.

Political discourse today has become very strident and full of hate and anger. I came across this ghazal of Kaifi Azmi, which I think is very much relevant today as well. It is set against the backdrop of Shia-Sunni conflict but would apply equally to all communities.

अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ लहू तो नहीं,
ये कोई और जगह होगी लखनऊ तो नहीं

यहाँ तो चलती हैं छुरियाँ ज़बान से पहले,
ये मीर ‘अनीस’ की, ‘आतिश’ की गुफ़्तगू तो नहीं

टपक रहा है जो ज़ख्मों से दोनों फ़िरक़ों के
ब-गौर देखो ये इस्लाम का लहू तो नहीं

तुम इसका रख लो कोई और नाम मौजूँ-सा
किया है खून से जो तुमने वो वजू तो नहीं

बुझा रहे हैं आप जिसे अपने दामन से,
कहीं वो आप ही की शम-ए-आरज़ू तो नहीं

समझ के माल मेरा जिसको तुमने लूटा है,
पड़ोसियों! वो तुम्हारी ही आबरू तो नहीं –

  • कैफ़ी आज़्मी

अज़ा – शोक

My stray musings— This blog is written with my family and immediate circle of friends as intended readership, so everyone may not connect with some of the events or places described; not that I have any objections to others reading it. In fact, they are most welcome–