यूं न रह रह कर हमें तरसाइये

यूं न रह रह कर हमें तरसाइये
आइये, आ जाइए, आ जाइए

फिर वोही दानिश्ता ठोकर खाइए
फिर मेरी आगोश में गिर जाइए

मेरी दुनिया मुन्तजिर है आपकी
अपनी दुनिया छोड़ कर आ जाइए

ये हवा, ‘सागर’ ये हल्की चाँदनी
जी में आता है यहीं मर जाइए

   - मास्टर मदन, साग़र निज़ामी – १९३५

 

कोई ४१ साल बाद उसी धुन में एक दूसरे पहलू में यह ग़ज़ल आई –

दिल है हाज़िर, लीजिये, ले जाइए
और क्या क्या चाहिए, फरमाइए

प्यार धोखा है, तो धोखा ही सही,
चाहता है दिल कि धोखा खाइए

हम को अपना इन्तहां मंज़ूर है
और भी तरसाइए, तड़पाइए

इश्क़ वालों का मुक़द्दर है यही,
आप अपनी आग में जल जाइए

ना मिलेंगे आप अच्छी बात है
जीने वाले जी ही लेंगे, जाइए

ढूंढ ही लेंगे कोई अपना ख़ुदा
कब तलक पत्थर से सर टकराइये

  - जां निसार अख्तर – ‘सज्जो रानी, १९७६

एक ग़ज़ल

दिन ढलने पर ग़म के साए, मुझको गले लगाते हैं
मुझे अकेला बेबस पाकर, क़ाबिज़ वो हो जाते हैं

एक एक मंसूबे अपने, शाम तलक सब डूब गए,
वक़्त बदलते देर न होगी, दिल को हम बहलाते हैं

साफ़बयानी, बेबाक़ी का, दरबारों में ठौर नहीं,
बात घुमा कर कहने वाले, आलिम अब कहलाते हैं

सबको अपने ही सांचे में, ढाले बिना न दम लेंगे,
मुझको यूं आज़ाद देख कर, बंदिश नई लगाते हैं

दोस्त मेरे, अहबाब मेरे, देख मेरी खामोशी को,
जो बातें ख़ुद समझ ना पाए, मुझको वो समझाते हैं

क़ुदरत का क़ानून है समझो, कोई बदल न पाया है,
बुरे और अच्छे दिन यारों, दोनों आते जाते हैं

- प्रताप श्रीवास्तव

गुजरात के जंगली गधे

इन दिनों गुजरात के जंगली गधों के बारे में गुजरात पर्यटन के लिए किया गया अमिताभ बच्चन का एक विज्ञापन बहुचर्चित है.

ऐसे अनोखे गधे गुजरात में ही क्यूँ पाए जाते हैं? कोई भौगोलिक कारण होगा. जो भी हो, इसमें संदेह नहीं कि गधा जैसा निरीह प्राणी हेय दृष्टि से देखा जाता है. सरल स्वभाव मंदबुद्ध होने का द्योतक है, ऐसी मान्यता है.

बचपन में गधे की उपाधि से बहुधा अलंकृत होने का अवसर मिल जाया करता था. चुनाव के वाक्-युद्धों में गधे की चर्चा ने उन दिनों की याद दिला दी.

हमारे गणित के अध्यापक कुछ अधिक अनुशासनप्रिय थे. गृहकार्य अपूर्ण होने जैसे तुच्छ अपराध उनकी दृष्टि में अक्षम्य थे. वह पहले बेंच पर खड़ा कर देते थे फिर आगे का संवाद ‘अबे गदहे!’ के संबोधन से प्रारम्भ करते थे. ‘गधे’ शब्द का ध्वनि-विच्छेद करके, ‘ग-द-हे’ में परिवर्तन कर के, लम्बी साँस खींच के जो दीर्घ मात्राओं से विस्तार कर के, जो स्नेहातिरेक का प्रहार करते थे, जो अभी तक मानस-पटल पर अंकित है. हमारा मनोबल पूर्णतया तिरोहित नहीं हो जाता था, उसके दो कारण थे. एक तो उनका ही छोटा भाई, जो हमारा सहपाठी था और अपराध का सहभागी भी था, बगल में खड़ा हुआ, अति धीमे स्वरों में उनकी स्वर-लहरी का अनुकरण करता था. गुरुतर कारण यह था कि न जाने कैसे उस गर्जन-तर्जन में एक गुरु का शिष्य-प्रेम भी उतर आता और हमें झलक भी जाता था.

Political discourse today has become very strident and full of hate and anger. I came across this ghazal of Kaifi Azmi, which I think is very much relevant today as well. It is set against the backdrop of Shia-Sunni conflict but would apply equally to all communities.

अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ लहू तो नहीं,
ये कोई और जगह होगी लखनऊ तो नहीं

यहाँ तो चलती हैं छुरियाँ ज़बान से पहले,
ये मीर ‘अनीस’ की, ‘आतिश’ की गुफ़्तगू तो नहीं

टपक रहा है जो ज़ख्मों से दोनों फ़िरक़ों के
ब-गौर देखो ये इस्लाम का लहू तो नहीं

तुम इसका रख लो कोई और नाम मौजूँ-सा
किया है खून से जो तुमने वो वजू तो नहीं

बुझा रहे हैं आप जिसे अपने दामन से,
कहीं वो आप ही की शम-ए-आरज़ू तो नहीं

समझ के माल मेरा जिसको तुमने लूटा है,
पड़ोसियों! वो तुम्हारी ही आबरू तो नहीं –

  • कैफ़ी आज़्मी

अज़ा – शोक

Secularism and Islam

You must have seen the Video ‘Hindustani Musalmaan’ which is going viral these days. The poem is detailed by Jansatta as given below:

“सोशल मीडिया पर एक वीडियो इन दिनों ट्रेंड कर रहा है। उसमें एक शख्स अपने आप से पूछ रहा है कि ‘मैं कैसा मुसलमान हूं भाई?’ इस वीडियो में बोल रहा शख्स अपने आप से कई तरह के सवाल पूछता है। फिर खुद ही उनके जवाब भी देता है। वीडियो की शुरुआत, ‘सड़क पर सिगरेट पीते वक्त जो अजान सुनाई दी मुझको तो याद आया कि वक्त है क्या और बात जहन में ये आई कि मैं कैसा मुसलमान हूं भाई ? मैं शिया हूं, या सुन्नी हूं, खोजा हूं या बोहरी हूं मैं गांव से हूं या शहर से हूं, मैं बागी हूं या फिर सूफी हूं, मैं कौमी हूं या ढोंगी हूं, मै कैसा मुसलमान हूं भाई ? मैं अल्लाह-अल्लाह करता हूं या फिर शेखों से लड़ पड़ता हूं ? मैं कैसा मुसलमान हूं ?’

इसके बाद वह शख्स अपने आपको हिंदुस्तान का मुसलमान बताते हुए कहता है, ‘मैं हिंदुस्तानी मुसलमान हूं भाई, मुझमें गीता का सार भी है, मुझमें उर्दू का अखबार भी है, मेरा एक महीना रमजान भी है मैंने किया तो गंगा स्नान भी है, अपने ही तौर से जीता हूं, दारू सिगरेट भी पीता हूं, कोई नेता मेरे नस-नस में नहीं, मैं किसी मुसलमान के बस में नहीं। मैं हिंदुस्तानी मुसलमान हूं भाई।‘

यह वीडियो हुसैन हैदरी का है। यूट्यूब पर इसे एक चैनल पर 55 हजार से ज्यादा लोग देख चुके हैं। एक निजी चैनल से बात करते हुए हुसैन हैदरी ने बताया कि वह बहुत ज्यादा धार्मिक इंसान नहीं हैं। हुसैन हैदरी ने कहा कि वह खुद के अंदर चल रहे सवालों के जवाब ढूंढ़ना चाहते थे उसी में उन्होंने कविता लिखी।“

 

All religions carry a bundle of contradictions. How that society manages those contradictions defines the peace in that society. The Bible has many violent instructions for dealing with non-believers, but somehow the Christians have managed to contain them. Islam, with its regional variations was also able to find some solutions to this seemingly intractable problem, but the recent trends towards Salafism have made it difficult. The Hindus have many problems of their own and should not take a holier-than-thou attitude, but I am not talking about them solely to concentrate on Islam in India.

 Challenge for Muslims

(Based on Al Mawarid)

Muslim Madrassas and their political movements have four main doctrines which are problematic.

  1. Polytheism, Kufr or Apostasy committed anywhere in the world are all punishable by death and we have the right to implement the punishments
  2. Non-Muslims were born to be subjugated. None other than Muslims have the right to govern. Every Non-Muslim government is illegitimate. We shall overthrow any such government whenever we have the capacity.
  3. All the Muslims in the world shall be under the rule of single Islamic government called “The Caliphate”. Their independent states have no legitimacy.
  4. The modern Nation state is a form of Kufr and there is no room in Islam for it.

The challenge for the Muslims is to get around these instructions given in their holy books. The first step would be to accept them as the problems.

The hope that the white man will solve this problem is not borne out by experience. In fact, he has done everything possible to encourage all the Jihadi elements and protected the Saudi regime, presumably with the view to protect its Oil interests. Its attempts for the last 75 years to tame the Arabs and Iranians have failed. Strong arm tactics are of no avail in Vietnam and China. It is no longer possible to subjugate nations.

There are 18 million Muslims in India. I am unable to see any possibility of a solution other than reforms. The Mughals, i.e. the earlier wiser ones, could see this as a problem for their empire. They intentionally moved their religious inclinations from Haj, Mecca and Medina to Sufi saints and their shrines in India e.g. Ajmer and Nizamuddin. Awadh went many steps ahead with the Nawab taking active part in all local festivals. Muslim ceremonies were heavily Indianised. Mir Anis, the famous poet of Marsia uses imagery which is much more Indian than Arabian. I am a firm believer in Secularism as our only hope.

The Sangh Parivar strategy is of subjugation which can only have disastrous consequences. There should be no shame in being tolerant and virtuous, but they seem to think so and keep taunting everyone in the name of Muslim appeasement. I find that they are secret admirers of Muslim hardliners and are in fact copying them. If adopted as a strategy it is going to fail.

पछतावे –

मज़हबों में न बदगुमाँ होते
सिर्फ़ इंसान हम यहाँ होते

साथ जो मेरे आप याँ होते,
हम भी फिर आज गुलफिशाँ होते

फ़िरकों में फिर वतन न बंट जाता
अश्क़ माँ के न रायगाँ होते

यूं उजड़ते न ये गली कूचे
आमने सामने मकाँ होते

तुम हमारे हुए चलो ना सही
फ़ासले कम तो दरमियाँ होते

रहता आबाद आशियाँ अपना
अपने फ़रज़न्द हमज़बाँ होते

खूब खेले हो तुम बहारों में
थोड़े मानूस-ए-खिजाँ होते -
  • प्रताप श्रीवास्तव – १८ जनवरी २०१७
गुलफिशाँ – फूल बांटने वाला
रायगाँ – व्यर्थ
फ़रज़न्द – बेटे
मानूस-ए-खिजाँ – पतझड़ के आदी

Blind Faith


Your query asking for my views on “how intelligent humans can keep their mind hostage to one book”, is a hard one. I think it begins with the uncomfortable eternal question “What is the purpose of your life”? – which does not have a straight answer.

I think that we tend to find an easy way out of any difficulty, laziness perhaps comes naturally to us. Not able to answer it ourselves, we ask a Religious Guru for guidance, subordinating our thinking capability to him. We are now at peace, so-and-so great man said this—, seems to satisfy us. We feel assured that strict following will ensure Moksha, Nirvana or heaven or 72 virgins or whatever in afterlife.

Religious and political leaders take full advantage of this human weakness and prescribe their book to us advising us to follow it faithfully to the letter. It is still easier if this belief is instilled in our minds since early childhood.

We also know by experience that ‘drill’ is very helpful. The endless marching and parades by military men serves the purpose to making blind obedience of instructions our second nature. The religious leaders prescribe daily prayer routines, fasts, penances, pilgrimage to achieve complete domination of our minds. It is a Win-win situation both are now happy and that is why all religions succeed in getting believers in their fold.

Ghalib saw through this 200 years ago,

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के बहलाने को ‘ग़ालिब’ ये ख्याल अच्छा है –

Regards,

–       Pratap Srivastava

My stray musings— This blog is written with my family and immediate circle of friends as intended readership, so everyone may not connect with some of the events or places described; not that I have any objections to others reading it. In fact, they are most welcome–