इरतिक़ा

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इरतिक़ा - Evolution

जो जैसा है सदा वैसा नहीं था
घड़ा कच्चा था जब पक्का नहीं था 

भरोसा उस पे कम रखती थी दुनिया,
ज़माने ने उसे परखा नहीं था

छिपे किरदार में कितने हुनर थे,
वो शोला था, मगर दहका नहीं था

सिखाया वक़्त ने, कुछ हौसले ने,
कड़ी मेहनत से जो डरता नहीं था

तरक़्की के बुना करते थे सपने,
दिल-ए-नाकाम का चर्चा नहीं था

बहुत अरमान थे मन में हमारे,
वो मज़हब का कोई मसला नहीँ था

नहीं खुदगर्ज़ थे, नादान थे तब
हुक़ूमत का हमें चस्का नहीं था

हुआ फिर नाम उसका भी जहाँ में
कोई उसके सिवा दिखता नहीं था

हुक़ूमत का अजब दस्तूर देखा,
वो कहता था बहुत, सुनता नहीं था

जो हाथों हाथ ले लेता था मुझको,
कल उसने देख कर देखा नहीं था

सम्हालो, ध्यान से, टूटें न नाते,
मैं तुमसे बारहा कहता नहीं था

अभी तो और आयेंगे हजारों,
ज़माने में कोई यकता नहीं था

बहुत कुछ भूल पाया ज़िंदगी में,
तुझे पर भूल मैं सकता नहीं था

प्रताप श्रीवास्तव – 14 फरवरी 2020

हिजरत (Exodus)

       हिजरत (Exodus)

बढ़ चलो आगे कि हमको दूर जाना है अभी 
राह के कितने सराबों को हटाना है अभी          mirages 

मज़हबों के दाम हैं फैला दिए सैयाद ने,          religions, snares, hunter 
तोड़ कितने और बंधन पार पाना है अभी 

ढो रहे कंधे पे हैं सब आप अपने ही सलीब,       cross 
मिल सका हमको न कोई आस्ताना है अभी       home, refuge 

हुक्मनामा रोज़ मिलता है नया शाम-ओ-सहर,
ज़िंदगी तुझको भी तो हमको निभाना है अभी 

भूख से हैं जाँ-ब-लब जो क़ाफ़िले सड़कों पे हैं,      at death’s door 
ऐ मसीहा और कितना आज़माना है अभी         saviour 

हौसला रखो रफ़ीक़ों जंग लंबी है ज़रूर,           friends 
ज़ुल्मतों के जाल से आगे ठिकाना है अभी        webs of darkness 

रायगाँ होने न देंगे आज का लंबा सफ़र,          waste 
इक नया हिन्दोस्तां मिलकर बनाना है अभी 

-  प्रताप श्रीवास्तव – 30 मार्च 2020/ 3 मई 2020

	

शब-ए-ख़ामोश

This is my interpretation of the poem “Oft in the stilly night” by Thomas Moore (1779-1852).

Oft in the stilly night,
Ere slumber’s chain has bound me,
Fond Memory brings the light
Of other days around me:

Reshma has sung a few stanzas of the Urdu interpretation by Nadir Kakorvi (1887-1912).
I have used the same construct. – Pratap Srivastava

शब-ए-ख़ामोश (Night of Silence)

अक्सर शब-ए-ख़ामोश में,
कुछ नींद औ कुछ होश में,
लौटा हूँ मैं कितने बरस,
आँखें गयीं जिनको तरस

मेरे खयालों की लहर
खोले है माज़ी के वो दर (doors of the past)
सरगोशियों के सिलसिले  (whispers)
बेसाख्ता वो कहकहे (spontaneous laughter)
अपने लिए मामूल थे (normal)
यारों के वो दस्तूर थे (norm)
याद आ रहे हैं सब के सब,
अक्सर शब-ए-ख़ामोश में ----

दिन दूसरे फिर आ गए,
वो फूल अब मुरझा गए
कुछ दूर हमसे हो गए
या इस जहाँ से खो गए
वो महफिलें वीराँ हुईं,
वो बस्तियाँ सोज़ाँ हुईं (burning)
याद आ रहे हैं सब के सब,
अक्सर शब-ए-ख़ामोश में ----

इक हूक उठती मन में है,
इक दर्द उस चुभन में है
दिलकश दिनों की याद तब (beautiful)
देती सुकूँ  इस दिल को अब, (solace)
और नींद से माज़ूर मैं (मजबूर)
सो जाऊँ थक के चूर मैं
अक्सर शब-ए-ख़ामोश में
अक्सर शब-ए-ख़ामोश में ----

प्रताप श्रीवास्तव – 12 मार्च 2020

इलाहाबाद में

इलाहाबाद में पापा और चाचा शाम को बैठे टीवी पर कोई देख रहे थे. इस दृश्य से प्रेरित,

एक कुण्डली:-

चाचा पापा देखते, टीवी पर वृत्तान्त,
जाने कब तक होएगा, इस ड्रामे का अंत –
इस ड्रामे का अंत सखी कभहूँ ना होए,
क्रूर हँसे बलवंत, नायिका जाए रोये –
कुटिल नारियां फैलायें घनघोर सियापा,
यत्न समझाने का करते हैं चाचा पापा
दोहे –
नौ रस से परिपूर्ण ये, नाट्य कथा का दौर,
दृष्टि पटल पर घूमता, किन्तु सखी कुछ और,
नब्बे बरसों की कथा आने लगी समक्ष,
विधि का लिख्खा सीरियल, और न कुछ समकक्ष –
दुःख और सुख दोनों मिलें, जीवन के पर्यंत,
पतझड़ उतने भोगने, जितने मिले वसन्त-
आंखों में अवसाद औ, होंठों पर मुस्कान,
साथ पहनना ओढ़ना, पाया है ये ज्ञान –

  • प्रताप श्रीवास्तव

बदला हुआ है मौसम

बदला हुआ है मौसम, कुछ सर्द हैं हवाएँ,
बदले हुए हैं तेवर, बदली सी हैं फ़िजाएँ  

छोड़ो भी गिले शिकवे, छोड़ो भी इल्तिजाएँ,
ज़ख्मों को भला कब तक, यूँ खोल कर दिखाएँ

कोशिश तो कर रहा हूँ, कितने जतन किए हैं,
भरतीं नहीं हैं फिर भी, आखिर मेरी ख़लाएँ

अन्जान नेकियाँ थीं जो आप हम मिले थे
अनजान वो गुनाह थे, जो दे गए सज़ाएँ 

लो काम मोहब्बत से, कोशिश करो अमन की,
जंगों से महज़ रहबर, बनती हैं करबलाएँ

मानेंगे तुम को क़ायद, आवाम बन्दापरवर,
छूटे हैं जो सफ़र में, देदें अगर दुआएँ

 - प्रताप श्रीवास्तव – 10-12-2019
खलाएँ – खाली जगह, empty spaces
रहबर – नेता
क़ायद – नेता, राह दिखाने वाला


 

 

आँखों में कई ख्वाब रचाये हुए तो हैं

आँखों में कई ख्वाब रचाये हुए तो हैं,  
अश्कों के आबशार छुपाये हुए तो हैं  

माना कि अब वो आग बाक़ी नहीं रही,
सीने मे गरम राख दबाये हुए तो हैं

है मुफ़लिसी का दौर नाज़िल ज़रूर आज,
माज़ी में दौलतें जो लुटाये हुए तो हैं 

दस्तूर है क़ायम कोई, आये या न आये,
बैठक को रोज़ अपनी सजाये हुए तो हैं

ग़ुफ्तार की क़ुव्वत है, अभी तक बनी हुई,
लुत्फ़-ए-ज़बाँ क़लम में बचाये हुए तो हैं

 प्रताप श्रीवास्तव 5 अक्टूबर 2019
आबशार : झरना 
मुफ़लिसी : ग़रीबी  
नाज़िल : आया हुआ 
माज़ी : गए वक़्त 
गुफ़्तार की क़ुव्वत : ability to talk
लुत्फ़-ए-ज़बाँ: beauty of the language

वैसे तो आप सब की इनायात आजकल

वैसे तो आप सब की इनायात आजकल 
उठते हैं मिरे दिल में सवालात आजकल,

क्यूँ शफ़क़तों से खाली, हैं आज दिल हमारे,
मेरे वतन में कैसी रिवायात आजकल 

क़िस्से तवील अपने, सुनता ही नहीं कोई 
कैसे बयां हो हर्फ़-ओ-हिकायात आजकल 

शायद वो समझ जायेँ, गर बात मिरी सुन लें 
होती नहीं है कोई मुलाक़ात आजकल 

हैं टूट रहे नाते, बरसों के याराने,
आपस में हो रही है खुराफ़ात आजकल 

है शहर अम्न में या मातम में डूबा है,
करता नहीं है कोई शिकायात आजकल 

सबकी अलग हैं चाहें, सबकी अलग हैं राहें,
गांधी की भुला दीँ हैं हिदायात आजकल

 - प्रताप श्रीवास्तव - 31 अगस्त 2019
शफ़क़तों  - compassion (pl)
तवील     - लंबे 
हर्फ़-ओ-हिकायात – anecdotes , stories 
हिदायात – guidance (pl)

थोड़ा देखा है थोड़ा बाक़ी है

थोड़ा देखा है थोड़ा बाक़ी है 
ठहरो कुछ देर कहता साक़ी है

लब पे शीरीं ज़बान में बातें,
पहने लेकिन लिबास खाकी है

उन से उलझो नहीं अभी हमदम,
सात खूनों की उनको मुआफ़ी है

हमसे ये बंदगी न हो पाई 
अपना अंदाज तो आफ़ाक़ी है

इश्क़ वालों समेट लो चादर,
रिश्ता सबका यहाँ सियासी है 

 प्रताप श्रीवास्तव – 24  जून 2019

वक़्त भी ऐसे गुज़रता जा रहा है

वक़्त भी ऐसे गुज़रता जा रहा है
फाइलें बाबू कोई सरका रहा है

सर्दियाँ आते ही रुखसत हो चलीं हैं
रस्म मालिक भी निभाये जा रहा है

मौसम-ए-गुल जल्द ही जाने को है
याद जैसे कोई दिलबर आ रहा है

आने वाले दिन सुनहरे हैं हमारे
हुक्मराँ हर एक यूँ बहला रहा है

सिर्फ आशिक़ एक दरिया के किनारे
गीत उल्फ़त के मुसलसल गा रहा है

- प्रताप श्रीवास्तव – २६ अप्रैल २०१९

पोतियों की सालगिरह

प्रिय श्रेया और दिया,

खुशनुमा ज़ीस्त का सफ़र रखना
दीन दुखियों की भी खबर रखना

ख़ूबसूरत लगेंगी कुछ राहें,
नेक जो हो वही डगर रखना

कुछ तो दुश्वारियाँ भी आयेंगी
हौसलों से भरा जिगर रखना

राहबर मिल सके तो बेहतर है,
रहज़नों पर मगर नज़र रखना

हो सके सुनके हर कोई क़ायल,
अपनी बातों में वो असर रखना 

मशविरे सबसे ले लिया करना,
लेकिन ईमान की क़दर रखना

कामयाबी का ताज जब पाना,
पाँव अपने ज़मीन पर रखना

रात चाहे भी कितनी काली हो,
दिल में आती हुई सहर रखना

- दादू 25 -01-2019
ज़ीस्त          Life
डगर          Path 
दुश्वारियाँ        Difficulties
राहबर         Guide
रहज़नों         Highway Robbers
क़ायल         Convinced
मशविरे         Advice
सहर          Morning

My stray musings— This blog is written with my family and immediate circle of friends as intended readership, so everyone may not connect with some of the events or places described; not that I have any objections to others reading it. In fact, they are most welcome–