वक़्त भी ऐसे गुज़रता जा रहा है

वक़्त भी ऐसे गुज़रता जा रहा है
फाइलें बाबू कोई सरका रहा है

सर्दियाँ आते ही रुखसत हो चलीं हैं
रस्म मालिक भी निभाये जा रहा है

मौसम-ए-गुल जल्द ही जाने को है
याद जैसे कोई दिलबर आ रहा है

आने वाले दिन सुनहरे हैं हमारे
हुक्मराँ हर एक यूँ बहला रहा है

सिर्फ आशिक़ एक दरिया के किनारे
गीत उल्फ़त के मुसलसल गा रहा है

- प्रताप श्रीवास्तव – २६ अप्रैल २०१९
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प्रिय श्रेया और दिया,

खुशनुमा ज़ीस्त का सफ़र रखना
दीन दुखियों की भी खबर रखना

ख़ूबसूरत लगेंगी कुछ राहें,
नेक जो हो वही डगर रखना

कुछ तो दुश्वारियाँ भी आयेंगी
हौसलों से भरा जिगर रखना

राहबर मिल सके तो बेहतर है,
रहज़नों पर मगर नज़र रखना

हो सके सुनके हर कोई क़ायल,
अपनी बातों में वो असर रखना 

मशविरे सबसे ले लिया करना,
लेकिन ईमान की क़दर रखना

कामयाबी का ताज जब पाना,
पाँव अपने ज़मीन पर रखना

रात चाहे भी कितनी काली हो,
दिल में आती हुई सहर रखना

- दादू 25 -01-2019
ज़ीस्त          Life
डगर          Path 
दुश्वारियाँ        Difficulties
राहबर         Guide
रहज़नों         Highway Robbers
क़ायल         Convinced
मशविरे         Advice
सहर          Morning

बदलते रहे दिल के हालात क्या क्या

बदलते रहे दिल के हालात क्या क्या
सम्हाले हैँ तूफ़ाने-जज़्बात क्या क्या

ग़ज़ब की हुई थी अक़ीदतशियारी,
मोहब्बत कराये करामात क्या क्या

टपकती छतेँ हैं पुराने मकाँ की,
हरे कर गयी ज़ख्म बरसात क्या क्या

कुछ आँसू, कुछ आहें, औ मीठी सी यादें,
मिली वक़्त से भी तो सौग़ात क्या क्या

नहीं लौट पाये वो गुज़रे ज़माने
गो करते रहे हम मुनाजात क्या क्या

हुए लाख नाकाम गोया हर इक दिन,
नये ख्वाब लाती है हर रात क्या क्या

-  प्रताप श्रीवास्तव – अगस्त 2018
अक़ीदतशियारी – श्रद्धा
मुनाजात – प्रार्थना

शब-गज़ीदा सहर

दो घड़ी को तू ज़रा थम, ज़िंदगी
थक गया हूँ, भर लूं कुछ दम, ज़िंदगी

रात की जागी हुई, हारी हुई,
लड़खड़ाती सहर मुबहम, ज़िंदगी 

देख कर हारा हुआ मायूस दिल,
पोंछती है चश्म-ए-पुरनम, ज़िंदगी

बारहा गाती है बुलबुल शाख़ से,
चाह जीने की न रख कम, ज़िंदगी

स्कूल से किलकारियों का शोरोग़ुल,
जोश भर दे, जैसे सरगम, ज़िंदगी

झूमते मस्ती में बगिया के गुलाब,
देख तो फूलों पे शबनम, ज़िंदगी

चल मनायें साथ में जश्न-ए-हयात,
जाम-ए-सेहत लें उठा हम, ज़िंदगी

- प्रताप श्रीवास्तव – सितम्बर 2018
शब-गज़ीदा – रात द्वारा घायल की हुई
सहर  – सुबह
मुबहम – धुंधला
चश्म-ए-पुरनम – भीगी आँखें  
हयात – जीवन

खिलने लगा है गुलशन

खिलने लगा है गुलशन, गाने लगीं हवाएं
उम्मीद के सुख़नवर, आओ दिए जलाएँ

अब गीत नए गाओ, छोड़ो भी गिले शिकवे,
ज़ख्मों को भला कब तक, यूँ खोल कर दिखाएँ 

कोशिश तो कर रहा हूँ, कितने जतन किए हैं,
भरतीं नहीं हैं फिर भी, आखिर मेरी ख़लाएँ

अन्जान नेकियाँ थीं जो आप हम मिले थे
अनजान वो गुनाह थे, जो मिल रहीं सज़ाएँ

लो काम मोहब्बत से, कोशिश करो अमन की,
जंगों से महज़ रहबर, बनती हैं करबलाएँ

मानेंगे तुम को क़ायद, आवाम बन्दापरवर,
छूटे थे जो सफ़र में, देदें अगर दुआएँ
  •  प्रताप श्रीवास्तव – 20-12-2018
सुखनवर – कवि
खलाएँ – खाली जगह, empty spaces
रहबर – नेता
क़ायद – नेता, राह दिखाने वाला

कुज शौक़ सी यार फ़क़ीरी दा

कुज शौक़ सी यार फ़क़ीरी दा
कुज इश्क़ ने दर दर रोल दित्ता
कुज साजन कसर ना छोड़ी सी
कुज ज़हर रकीबां घोल दित्ता

कुज हिजर फ़िराक़ दा रंग चढ़या
कुज दर्द माही अनमोल दित्ता
कुज सड़ गयी क़िस्मत बदक़िस्मत दी
कुज प्यार विच जुदाई रोल दित्ता

कुज औंजवी राह्वां औखियाँ सन
कुज गल विच ग़माँ दा तौक वी सी
कुज शहर दे लोग वी ज़ालिम सन
कुज सानू मरण दा शौक़ वी सी

- मुनीर नियाजी

मुनीर नियाजी की पंजाबी नज़्म का तर्जुमा:

कुछ शौक़ था यार फ़क़ीरी का,
कुछ इश्क़ ने हमको मारा था
कुछ ज़ुल्म सजन के हाथ हुए,
कुछ ज़हर रक़ीब ने डाला था –

कुछ हिज्र-फ़िराक़ का रंग चढ़ा,
कुछ माही ने तड़पाया था
कुछ बदक़िस्मत की किस्मत थी,
कुछ दर्द-ए-जुदाई छाया था

कुछ मुश्किल मेरी राहें थीं,
कुछ ग़म का गले में तौक़ भी था
कुछ शहर के लोग भी ज़ालिम थे,
मरने का मुझे कुछ शौक़ भी था -
-  प्रताप श्रीवास्तव – 11-12-2018

नालों में मेरे अब भी असर है कि नहीं है

नालों में मेरे अब भी असर है कि नहीं है
कुछ तुमको हमारी भी खबर है कि नहीं है

दीवाने भी पल जाते थे अहल-ए-ख़िरद के साथ,
इस दौर में आशिक़ का गुज़र है कि नहीं है

हाकिम ने है बनवाई इक ऊँची कचहरी,
मुफ़लिस के लिए कोई भी दर है कि नहीं है 

सुनते हैं कि गावों का बहुत हो गया फ़रोग,
चौबारे में वो बूढ़ा शजर है कि नहीं है

मिल कर बसाई थी जहाँ इक दूसरी दुनिया,
अब याद वो सपनों का नगर है कि नहीं है

ता-उम्र कर गयी थी जो हम को बेक़रार,
अब भी वो झुकी झुकी नज़र है कि नहीं है

-  प्रताप श्रीवास्तव – 22-7-2018
नालों – फ़रियाद
अहल-ए-ख़िरद – बुद्धिमान लोग
फ़रोग – विकास
शजर – पेड़
मुफ़लिस – ग़रीब

My stray musings— This blog is written with my family and immediate circle of friends as intended readership, so everyone may not connect with some of the events or places described; not that I have any objections to others reading it. In fact, they are most welcome–